Wednesday, 18 February 2026

घर की मर्यादा को बाहरी तमाशा मत बनाइए!"क्या आप जानते हैं कि आपके घर की चारदीवारी के बाहर खड़ा हर शख्स 'मदद' के लिए नहीं, बल्कि 'मजे' के लिए खड़ा है? जब हम अपनों की शिकायत गैरों की महफ़िल में करते हैं, तो हम सिर्फ़ अपना दर्द नहीं बाँट रहे होते, बल्कि अपनी इज़्ज़त की बोली लगा रहे होते हैं। सावधान! जो हाथ आपकी आग बुझाने का नाटक कर रहे हैं, कहीं वही हाथ उसे हवा तो नहीं दे रहे?" एक कड़वी हकीकत ।।घर के अंदर का मनमुटाव जब तक अंदर है, वह एक 'सुलझने वाला झगड़ा' है। लेकिन जैसे ही वह बात दहलीज़ पार करके गैरों तक पहुँचती है, वह मोहल्ले का 'तमाशा' बन जाती है। याद रखिये, बाहर वाले कभी आग बुझाने नहीं आते; वे तो बस उस तपन पर अपने हाथ सेंकने और आपके बिखरने का आनंद लेने आते हैं। जो इंसान अपने घर की इज़्ज़त का मज़ाक गैरों के सामने उड़ाता है, वह असल में अपनी ही इज़्ज़त नीलाम कर रहा होता है। गैरों की उस ज़हरीली 'मीठी सलाह' से कहीं बेहतर है कि हम अपनों की 'कड़वी डाँट' सुन लें। क्योंकि उस डाँट में सुधार की नीयत और सुरक्षा का भाव होता है, जबकि पराई मिठास में अक्सर तबाही का मंजर छिपा होता है।।। "घर की बातों को तमाशा मत बनने दीजिए " ।।घर की बातें घर के अंदर, जब तक रहती पलती हैं,सुलझ सकें जो आपसी उलझन, भीतर ही वो ढलती हैं।पर चौखट लांघ के बात अगर, गैरों की महफ़िल जाएगी,याद रखना फिर वो चर्चा, बस 'तमाशा' बन जाएगी।बाहर वाले आग बुझाने, पानी लेकर कब आते हैं?वो तो बस जलते चूल्हे पर, अपने हाथ सेंक जाते हैं।जो घर की इज़्ज़त की नुमाइश, गैरों के आगे करता है,वो गैरों की नज़रों में भी, कौड़ी-कौड़ी गिरता है।मीठी बातों के पीछे अक्सर, गहरे जाल बिछे होंगे,हमदर्दी के मुखौटों में, चेहरे कई छुपे होंगे।गैरों की उस मीठी सलाह से, कड़वी डाँट भली अपनी,वो डाँट ही ढाल बनेगी कल, जब दुनिया होगी बेगानी।"सच कड़वा ज़रूर होता है, पर यही कड़वाहट रिश्तों को सड़ने से बचाती है। आज जो पर्दा हमने अपनी मर्यादा पर डाला है, वही कल हमारा मान बढ़ाएगा। याद रखिये, दुनिया सिर्फ़ तमाशा देखती है, साथ तो सिर्फ़ अपने ही खड़े होते हैं—चाहे वह कड़वी डाँट के साथ ही क्यों न हों।'रंजना की कलम' कभी मीठे भ्रम नहीं पालती, वह सिर्फ़ वही लिखती है जो हकीकत के धरातल पर घटता है। क्या आप तैयार हैं जीवन के अगले ऐसे ही एक अनछुए और बेबाक सच का सामना करने के लिए?जुड़े रहिये... क्योंकि अगली बार, मैं उस सच से परदा उठाऊँगी जिसे हम अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देते हैं।कलम मेरी, पर हकीकत आपकी।— रंजना की कलम"✍🏻।। आज का सवाल ।।क्या आपको भी लगता है कि अपनों की कड़वी डाँट गैरों की मीठी सलाह से बेहतर है? अपने विचार कमेंट में ज़रूर साझा करें।#रंजनाकीकलम #VisualArts #समाजकासच #रिश्तोंकीमर्यादा #प्रेरणा #सत्य #सावधान #जीवनदर्शन

Tuesday, 17 February 2026

ये धागे बहुत महीन हैं,अक्सर नज़र भी नहीं आते—पर मन की आँखें खुलें,🪬तो उनकी हलचल सुनाई देती है।ये धागे desires के हैं–⚕️डरों के हैं, आदतों के हैं,Society की उम्मीदों के हैं,और उस recognition के हैंजिसे हम “मैं” समझकर पकड़ते हैं।जब ये धागे दिखते हैं–तो खेल पूर्णतया बदल जाता है।जो दौड़ कभी ज़रूरी थी,शोर जैसी लगती है।जो जीत कभी गर्व देती थी,थोड़ी खाली-सी लगती है।😐Arrogance ढीला पड़ता है—✌️क्योंकि समझ आता है,जिसे मैं अपनी Strength समझता था,वो भी किसी धागे की जुंबिश थी।यहीं से–🥰Compassion जन्म लेती है।लोग अब rival नहीं लगते,बस दूसरी कठपुतलियाँ लगते हैं—अपने धागों में उलझे,अपनी compulsions में नाचते समझ आता है—💯दौड़ असली नहीं थी,मंज़िल तय नहीं थी,जीतने का मतलब भी झूठा था।सच तो बस इतना है—✔️चलना ही जीवन है,👈साँस लेना ही सफर है,और हर पलअपनी डोर को थोड़ा ढीला छोड़ देनासबसे बड़ी freedom है।तब कठपुतली होनाRestriction नहीं लगता—❌एक खेल जैसा लगता है,जहाँ 🙂 हुए नाचना समझदारी है।सवाल ये नहीं कि धागे हैं या नहीं,बल्कि ये है—❓क्या मैं इन धागों के साथ जीऊँगा,या इनके बावजूदथोड़ा-सा अपना भी नाच डालूँगा?🌷