Tuesday, 17 February 2026

ये धागे बहुत महीन हैं,अक्सर नज़र भी नहीं आते—पर मन की आँखें खुलें,🪬तो उनकी हलचल सुनाई देती है।ये धागे desires के हैं–⚕️डरों के हैं, आदतों के हैं,Society की उम्मीदों के हैं,और उस recognition के हैंजिसे हम “मैं” समझकर पकड़ते हैं।जब ये धागे दिखते हैं–तो खेल पूर्णतया बदल जाता है।जो दौड़ कभी ज़रूरी थी,शोर जैसी लगती है।जो जीत कभी गर्व देती थी,थोड़ी खाली-सी लगती है।😐Arrogance ढीला पड़ता है—✌️क्योंकि समझ आता है,जिसे मैं अपनी Strength समझता था,वो भी किसी धागे की जुंबिश थी।यहीं से–🥰Compassion जन्म लेती है।लोग अब rival नहीं लगते,बस दूसरी कठपुतलियाँ लगते हैं—अपने धागों में उलझे,अपनी compulsions में नाचते समझ आता है—💯दौड़ असली नहीं थी,मंज़िल तय नहीं थी,जीतने का मतलब भी झूठा था।सच तो बस इतना है—✔️चलना ही जीवन है,👈साँस लेना ही सफर है,और हर पलअपनी डोर को थोड़ा ढीला छोड़ देनासबसे बड़ी freedom है।तब कठपुतली होनाRestriction नहीं लगता—❌एक खेल जैसा लगता है,जहाँ 🙂 हुए नाचना समझदारी है।सवाल ये नहीं कि धागे हैं या नहीं,बल्कि ये है—❓क्या मैं इन धागों के साथ जीऊँगा,या इनके बावजूदथोड़ा-सा अपना भी नाच डालूँगा?🌷