Saturday, 1 October 2022

रिश्ते हमेशा एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए बनाए जाते हैं एक-दूसरे का इस्तेमाल करने केलिए नहीं !!

पत्नी के अंतिम संस्कार व तेरहवीं के बाद रिटायर्ड पोस्टमैन मनोहर गाँव छोड़कर मुम्बई में अपने पुत्र सुनील के बड़े से मकान में आये हुए हैं। सुनील बहुत मनुहार के बाद यहाँ ला पाया है। यद्यपि वह पहले भी कई बार प्रयास कर चुका था किंतु अम्मा ही बाबूजी को यह कह कर रोक देती थी कि 'कहाँ वहाँ बेटे बहू की ज़िंदगी में दखल देने चलेंगे। यहीं ठीक है। सारी जिंदगी यहीं गुजरी है और जो थोड़ी सी बची है उसे भी यहीं रह कर काट लेंगे। ठीक है न!' बस बाबूजी की इच्छा मर जाती। पर इस बार कोई साक्षात अवरोध नहीं था और पत्नी की स्मृतियों में बेटे के स्नेह से अधिक ताकत नहीं थी , इसलिए मनोहर बम्बई आ ही गए हैं।सुनील एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी में इंजीनियर है। उसने आलीशान घर व गाड़ी ले रखी है।घर में घुसते ही मनोहर ठिठक कर रुक गए। गुदगुदी मैट पर पैर रखे ही नहीं जा रहे हैं उनके। दरवाजे पर उन्हें रुका देख कर सुनील बोला - "आइये बाबूजी, अंदर आइये।"- "बेटा, मेरे गन्दे पैरों से यह कालीन गन्दी तो नहीं हो जाएगी।"- "बाबूजी, आप उसकी चिंता न करें। आइये यहाँ सोफे पर बैठ जाइए।"सहमें हुए कदमों में चलते हुए मनोहर जैसे ही सोफे पर बैठे तो उनकी चीख निकल गयी - अरे रे! मर गया रे!उनके बैठते ही नरम औऱ गुदगुदा सोफा की गद्दी अन्दर तक धँस गयी थी। इससे मनोहर चिहुँक कर चीख पड़े थे।चाय पीने के बाद सुनील ने मनोहर से कहा - "बाबूजी, आइये आपको घर दिखा दूँ अपना।"- "जरूर बेटा, चलो।"- "बाबू जी, यह है लॉबी जहाँ हम लोग चाय पी रहे थे। यहाँ पर कोई भी अतिथि आता है तो चाय नाश्ता और गपशप होती है। यह डाइनिंग हाल है। यहाँ पर हम लोग खाना खाते हैं। बाबूजी, यह रसोई है और इसी से जुड़ा हुआ यह भण्डार घर है। यहाँ रसोई से सम्बंधित सामग्री रखी जाती हैं। यह बच्चों का कमरा है।"- "तो बच्चे क्या अपने माँ बाप के साथ नहीं रहते?"- बाबूजी, यह शहर है और शहरों में मुंबई है। यहाँ बच्चे को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। माँ तो बस समय समय पर उसे दूध पिला देती है और उसके शेष कार्य आया आकर कर जाती है।"थोड़ा ठहर कर सुनील ने आगे कहा,"बाबूजी यह आपकी बहू और मेरे सोने का कमरा है और इस कोने में यह गेस्ट रूम है। कोई अतिथि आ जाए तो यहीं ठहरता है। यह छोटा सा कमरा पालतू जानवरों के लिए है। कभी कोई कुत्ता आदि पाला गया तो उसके लिए व्यवस्था कर रखी है।"सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुँचे सुनील ने लम्बी चौड़ी छत के एक कोने में बने एक टीन की छत वाले कमरे को खोल कर दिखाते हुए कहा - "बाबूजी यह है घर का कबाड़खाना। घर की सब टूटी फूटी और बेकार वस्तुएं यहीं पर एकत्र कर दी जाती हैं। और दीवाली- होली पर इसकी सफाई कर दी जाती है। ऊपर ही एक बाथरूम और टॉइलट भी बना हुआ है।"मनोहर ने देखा कि इसी कबाड़ख़ाने के अंदर एक फोल्डिंग चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ है और उसी पर उनका झोला रखा हुआ है। मनोहर ने पलट कर सुनील की तरफ देखा किन्तु वह उन्हें वहां अकेला छोड़ सरपट नीचे जा चुका था। मनोहर उस चारपाई पर बैठकर सोचने लगे कि 'कैसा यह घर है जहाँ पाले जाने वाले जानवरों के लिए अलग कमरे का विधान कर लिया जाता है किंतु बूढ़े माँ बाप के लिए नहीं। इनके लिए तो कबाड़ का कमरा ही उचित आवास मान लिया गया है। नहीं.. अभी मैं कबाड़ नहीं हुआ हूँ। सुनील की माँ की सोच बिल्कुल सही था। मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।'अगली सुबह जब सुनील मनोहर के लिए चाय लेकर ऊपर गया तो कक्ष को खाली पाया। बाबू जी का झोला भी नहीं था वहाँ। उसने टॉयलेट व बाथरूम भी देख लिये किन्तु बाबूजी वहाँ भी नहीं थे। वह झट से उतर कर नीचे आया तो पाया कि मेन गेट खुला हुआ है। उधर मनोहर टिकट लेकर गाँव वापसी के लिए सबेरे वाली गाड़ी में बैठ चुके थे। उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर देखा कि उनके 'अपने घर' की चाभी मौजूद थी। उन्होंने उसे कस कर मुट्ठी में पकड़ लिया। चलती हुई गाड़ी में उनके चेहरे को छू रही हवा उनके इस निर्णय को और मजबूत बना रही थी।स्वस्थ रहें व्यस्त रहें मस्त रहें 🥰

रिश्ते हमेशा एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए बनाए जाते हैं एक-दूसरे का इस्तेमाल करने केलिए नहीं !!

जिंदा बाप को रोटी नहीं. मरने के बाद खीर पूड़ीजीवित बाप से लट्ठम-लठ्ठा, मूवे गंग पहुँचईयाँ ।जब आवै आसौज का महीना, कऊवा बाप बनईयाँ ।।देवास। जब वृद्धो के हाथ पैर थक जाते है तब मां बाप बोझ लगने लगते हैं। यदि मां बाप के पास जमीन या पेन्शन है तो ऐसे मां बाप प्रायः अपने घर में जीवन गुजार लेते हैं। यदि कोई सहारा नहीं है तो बहू बेटा को वही मां बाप बोझ लगते हैं। जिन्होंने तिनका तिनका जोड़कर अपने बेटे बहू के लिये मकान बनाया। बच्चों को पढाया लिखाया खिलाया पिलाया जरूरत पड़ने पर और भी शौक पूरे कराये लेकिन आज जमीन या पॅशन ना होने की स्थिति में मां बाप बोझ वह वृद्धा आश्रम में कहां। सब जगह बन गये हैं। सरकार जो भी बेटे बहूयें जिम्मेदार है ऐसी बात वृद्धावस्था पेन्शन देती है उससे दो नहीं। बहुत जून की चटनी रोटी मिल सकती है पर उस रोटी को पकाने के लिये बात बात में नुक्त चीनी की आदत शरीर में ताकत चाहिए । बीमार पड़ने होती है। पर दवा भी। रोटी पकाने को गैस नयी पीढ़ी के युवाओं पर थोपना भी चाय के लिये दूध भी बहुत सी चाहते हैं। वृद्धों को चाहिए अपना राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली पेंशन पर्याप्त नहीं कही जा सकती। भजन करें सत्संग सुने व बात बात में वृद्धों को घर से निकालने के किस्से नुक्ताचीनी आम हैं पर जो सुख घर में मिलता है। 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जायेगा । वृद्धावस्था में सन्तयों तो पूरे भारतवर्ष में वृद्धावस्था आश्रम है। किसी में भ्रष्टाचार है तो से मामलों में वृद्ध लोग किसी में शिष्टाचार है। देवास स्थित भी जिम्मेदार हैं। कारण वृद्धों की वृद्धावस्था आश्रम की स्थिति अच्छी कही जाती है राजोदा रोड स्थित इस अपने पुराने संस्कारों को वृद्धावस्था आश्रम में 42 वृद्ध हैं तो 28 महिलायें है। पर बुजगों का इस पितृ पक्ष के महीने में अपना दुख है। सबका मानना था कि जीते जी उनकी की आदत छोड़ दें तो सन्ताने खाने को भोजन नहीं देते मरने के बाद श्राद्ध पिण्डदान तर्पण का लोक दिखावा करेंगे। इससे क्या फायदा ।रामपाल जी महाराज का सत्संग व नाम उपदेश संजीवनी का काम करेगा। सन्त रामपाल जी महाराज के नाम उपदेश से पिछली 7 पीढ़ी व अगली 101 पीढ़ी का उद्धार हो जाता है। खुद का आवागमन का चक्र समाप्त होगा व नाम जाप व सत्संग से समय भी कटेगा । सदबुद्धि भी जगेगी। घर में बच्चे सत्संग सुनेगे तो उनमें भी सुधार होगा।