कुछ रिश्तेदार ऐसे भी होते हैं जो बाहर से बहुत अपने लगते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर उनके इरादे बिल्कुल साफ नहीं होते। वे धीरे-धीरे एक आदमी के मन में उसके अपने ही बीवी और बच्चों के खिलाफ शक और दूरी पैदा करने लगते हैं। कभी वे पत्नी की छोटी-छोटी गलतियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, तो कभी बच्चों की बातों को गलत तरीके से पेश करते हैं। उनका मकसद सिर्फ एक ही होता है—उस आदमी को उसके असली परिवार से अलग कर देना।जब आदमी बार-बार ऐसी बातें सुनता है, तो उसके मन में धीरे-धीरे जहर भरने लगता है। वह अपनी पत्नी के प्यार और त्याग को भूलने लगता है, बच्चों की मासूमियत उसे दिखना बंद हो जाती है। उसे लगता है कि वही रिश्तेदार उसके सच्चे हितैषी हैं, जो उसे “सच्चाई” दिखा रहे हैं। लेकिन असल में यही वह समय होता है जब वह सबसे ज्यादा कमजोर हो जाता है।