Friday, 5 June 2020
बेवजह घर से निकलने की जरूरत क्या है |मौत से आँख मिलाने की जरूरत क्या है ||सबको मालूम है बाहर की हवा है कातिल |फिर कातिल से उलझने की जरूरत क्या है ||जिन्दगी हजार नियामत है, संभाल कर रखे |फिर कब्रगाहो को सजाने की जरूरत क्या है ||दिल को बहलाने के लिये, घर में वजह काफी है |फिर गलियों में बेवजह भटकने की जरूरत क्या है
बेवजह घर से निकलने की जरूरत क्या है कोरोना को घर लाने की जरूरत क्या है पूरे देश को मालूम है , लॉक डाउन है फिर घर से बाहर जाने की जरूरत क्या है मनुष्य तन मिला है , चौरासी लाख योनि पार करने परकब्रगाहों में जगह नहीं है , फिर मार करने की ज़रूरत क्या है बड़ी मुश्किल से घर में रहने की आई है घड़ीफिर घर से बाहर जाने की क्या है पड़ी
आजकल आती कहाँ हैं ज्यादा पीहर बेटियां 💃अपनी ही घर गृहस्ती बसाने में लगी रहती है बेटियाँ 💃जिम्मे-दारियों के बोझ तले दबी रहती है बेटियाँ 💃मन पीहर में लगा रहता है शरीर काम करते रहता है, कभी जताती नहीं है बेटियाँ 💃आँखें नम है फिर भी हँसते हुए फोन पर पीहर में सभी से बातें करती रहती हैं बेटियाँ 💃चंचल सी, नाजूक सी, मासूम सी, लेकिन अब सयानी सी हो गयी हैं बेटियाँ 💃जब कभी करते हैं शिकायत क्युं नहीं पीहर आती हैं बेटियांँ 💃 तो उल्टा नाराज होकर ड़ांटने के अंदाज में कहती हैं आपने इतने अच्छे संस्कार ही क्युं दिये ताकि ससुराल की जिम्मैदारी छोड़ कुछ दिनों के लिये सुस्ताने भी नहीं आ पाती है पीहर बेटियाँ 💃हाँ पीहर में किसी को भी कुछ भी हो जाये सब छोड़-छाड़ कर दौड़े चली आती हैं बेटियाँ 💃बाबूल का दिल है तो ससुराल की धड़कन होती हैं बेटियाँ💃 ✍️
#बेटियों पर तो बहुत #कविताएं सुनी हैं, लेकिन #एक_सास_द्वारा_रचित_अपनी_बहू पर यह कविता बहुत ही प्यारी व निराली हैं..🙅👸🙅👸“#मेरी_बेटी”👸🙅👸🙅एक बेटी मेरे घर में भी आई है,सिर के पीछे उछाले गये चावलों को,माँ के आँचल में छोड़कर,पाँव के अँगूठे से चावल का कलश लुढ़का कर,महावर रचे पैरों से, महालक्ष्मी का रूप लिये,बहू का नाम धरा लाई है.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.माँ ने सजा धजा कर बड़े अरमानों से,दामाद के साथ गठजोड़े में बाँध विदा किया, उसी गठजोड़े में मेरे बेटे के साथ बँधी, आँखो में सपनों का संसार लिये सजल नयन आई है.एक बेटी मेरे घर भी आई है.किताबों की अलमारी अपने भीतर संजोये,गुड्डे गुड़ियों का संसार छोड़ कर,जीवन का नया अध्याय पढ़ने और जीने,माँ की गृहस्थी छोड़, अपनी नई बनाने,बेटी से माँ का रूप धरने आई है.एक बेटी मेरे घर भी आई है.माँ के घर में उसकी हँसी गूँजती होगी, दीवार में लगी तस्वीरों में, माँ उसका चेहरा पढ़ती होगी, यहाँ उसकी चूड़ियाँ बजती हैं,घर के आँगन में उसने रंगोली सजाई है.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.शायद उसने माँ के घर की रसोई नहीं देखी,यहाँ रसोई में खड़ी वो डरी डरी सी घबराई है, मुझसे पूछ पूछ कर खाना बनाती है,मेरे बेटे को मनुहार से खिलाकर, प्रशंसा सुन खिलखिलाई है.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.अपनी ननद की चीज़ें देखकर,उसे अपनी सभी बातें याद आई हैं, सँभालती है, करीने से रखती है, जैसे अपना बचपन दोबारा जीती है, बरबस ही आँखें छलछला आई हैं.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.मुझे बेटी की याद आने पर “मैं हूँ ना”,कहकर तसल्ली देती है,उसे फ़ोन करके मिलने आने को कहती है,मायके से फ़ोन आने पर आँखें चमक उठती हैं, मिलने जाने के लिये तैयार होकर आई है.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.उसके लिये भी आसान नहीं था,पिता का आँगन छोड़ना,पर मेरे बेटे के साथ अपने सपने सजाने आई है,मैं खुश हूँ एक बेटी जाकर अपना घर बसा रही, एक यहाँ अपना संसार बसाने आई है.एक बेटी मेरे घर में भी आई है.#Copy_Paste
Thursday, 4 June 2020
तूफान, फिर तूफान, आंधी, ओले, बारिश, बर्फ, टिड्डीदल, भूकंप, और इन सबके साथ कोरोना तो चल ही रहा है। मानो प्रकृति कह रही हो, इंसान अब तो तू गया!! क्या आपको भी ऐसा ही लगता है?ये सब प्राकृतिक घटनाएं, कहीं-कहीं, कभी-कभी घटित हो रही है। पहले वाला तूफान बंगाल, उड़ीसा में आया था, अब महाराष्ट्र, गुजरात में आ रहा है। बर्फ हिमालय में गिरी थी, भूकंप दिल्ली में आया, और टिड्डीदल राजस्थान में। इसी तरह कोरोना के ज्यादातर मामले तो 6-7 शहरों से ही आए है। भारत बहुत बड़ा है। पर आज के कनेक्टेड वर्ल्ड में व्हाट्सएप और न्यूज चैनल्स के जरिये ये तमाम समस्याएं हम सबके घर तक पहुंच जाती है। और लगता है जैसे सारी की सारी समस्याएं सब जगहों पर है।अब एक गहरी सांस लेकर ये समझिये की आपके पांच किलोमीटर के दायरे में क्या क्या समस्याएं है? उससे सावधान रहिए, उस से निपटने के तैयारी कीजिए। और पांच किलोमीटर से ज्यादा दूर होने वाली समस्याओं के लिए, और जिन समस्याओं के लिए आप कुछ कर नहीं सकते, उनके लिए सब का भला हो ऐसी शुभकामनाएं दीजिए।आपको लगेगा उतनी मुश्किलें नहीं है जितना व्हाट्सएप और न्यूज चैनल्स देख कर किसी को लगता होगा!जय हिन्द
Corona मानव का दुश्मन और प्रकृति का दोस्त....कोरोना एक वायरस, जो मनुष्य का दुश्मन बन चला है, पर इस प्रकृति से एक दोस्ती निभा रहा है.....इस वायरस के जानलेवा हमले के डर से मानव आज घरों में कैद है, उसके अहंकार के प्रतीक उसके कल-कारखाने, चमचमाती तेज रफ्तार से दौड़ते उसके बनाये रेल, बस, मेट्रो, हवाई जहाज, जलपोत आज सब यूँ ही खड़े हैं।मानव के बनाये शानदार होटल पब, जिम, मॉल, पार्क जो उसके मनोरंजन के साधन और जगहें हैं, बड़े-बड़े पुल, सड़कें सब सुनसान हैं, मानव डरा दुबका, अपने घरों में बैठा है।पर इस कोरोना से जो न डरा है न सहमा है, वो है प्रकृति !आज प्रकृति खुश है कि वो फिर से मुस्कुरा सकती है, उसकी हवा शुद्ध हो गयी है, प्रकृति के आँचल में बहने वाली अनगिनत नदियों का जल फिर से निर्मल, पावन और स्वच्छ हो गया है, गाँव हो या नगर वहाँ के वृक्षों पर फिर से नन्हें पंछी दुबारा लौट आये हैं, जो न जाने कब से अपने आशियानों को छोड़ दर-दर भटक रहे थे, घने जंगलों में निवास करने वाले पशु-पक्षी अपने आसपास निर्दयी मानवजाती को न देख ईश्वर का आभार कर रहें हैं, वो जंगलों के पास बसे गाँवो और शहरों में आ कर झाँक रहें है कि आखिर ये अंहकारी मानव कहाँ विलुप्त हो गया, जो कभी रुकता नहीं थकता नहीं, रोज प्रकृति का शोषण कर अपनी विलासिता को पूरा करने में लगा रहता है था।आज सम्पूर्ण भारतकी नदियाँ खुश हैं, गोमुख से निकल गंगासागर में समाने वाली गंगा की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं है, गंगा को लग रहा है मानो वो फिर से सतयुग में प्रवेश कर गई है उन्हें खुद नहीं याद की अब से पहले इस कलयुग में उनका जल कब इतना साफ और स्वच्छ था।कोरोना मानव का दुश्मन जरूर बना है पर बस इसलिये की मानव जाति से समझ सके की उसका ज्ञान और विज्ञान तब तक किसी काम का नहीं जब तक वो प्रकृति का विनाश करता रहेगा, निर्दोष पशु-पक्षियों को मार कर खाता रहेगा।जब-जब मानव अपने अहंकार में डूब ये नीच और अमानवीय अपराध करता रहेगा तब तब प्रकृति के लिए कोरोना जैसा वायरस मानव को उसके कर्मों की सजा देने हर शताब्दी में किसी न किसी रूप में आता रहेगा....!पर सच में आज प्रकृति खुश है और मानव अपने कर्मो के कारण डरा-सहमा...
Wednesday, 3 June 2020
"ससुराल बना मायका....नंदिनी अलार्म बजते ही उठी ....अलार्म बंद किया और सोची थोड़ा और सो लूं लेकिन जिम्मेदारियों ने उसे झकझोर कर जगा दिया....आज उसे मायके की याद आ गई यह महीना मायके के नाम होता था क्योंकि चीनू की छुट्टी होती थी ..देर तक सोना, देर से नहाना मां के हाथ का बना गरमा गरम नाश्ता खाना ...जी भरकर घूमना-फिरना ...भैय्या और पापा से बतियाना ...वह जल्दी जल्दी तैयार भी हो रही थी और झुंझला भी रही थी इस लाॅकडाऊन पर ....मन ही मन बुदबुदा रही थी क्या बला है ये कोरोना भी हुँह... खैर ...चलो रसोई इंतजार कर रही है मम्मी पापा की चाय बनानी है । बिना नहाए रसोई में नहीं आना है यह निर्देश था मम्मी जी का शुरूआत से जिसे नंदिनी सात सालों मेें कभी नही भूली थी....रसोई की ओर जाने से पहले उसने एक नजर बिंदास सोते पति और बेटे चीनू पर डाली और धीरे से दरवाजा लगा कर सीढ़ियां उतरने लगी...रसोई से आ रही आवाज से उसका दिल धक्क से रह गया क्या मुझे देर हो गई.....जल्दी-जल्दी सीढ़ी उतरने हुए नंदिनी ने हाॅल पर लगी घड़ी पर नजर दौड़ाई .....नही देर कहा हुई मुझे सोचते हुए रसोई पहुंच गई....मम्मी जी को वहां देखकर भय और घबराहट में बोली मम्मी जी .. आप.... सब ठीक है ना...मुझे देर हो गई क्या...शालिनी (सास )ने मुस्कुराकर कहा अरे नही बेटा.... तू तो समय की पक्की है...फिर आपने चाय क्यो चढ़ा दी और कुकर भी लगा दिया ...मुझसे कोई गलती हो गई क्या...सौरी मम्मी जी ....नंदिनी अब भी सहमी हुई थी, क्योंकि ऐसा तभी होता था जब मम्मी जी नाराज होती थी...पर यह क्या जवाब में शालिनी ने नंदिनी को गले लगा लिया और माथा चूमकर बोली गलती तो मुझसे हो रही थी उसे सुधार रही हूं.....यह गर्मी की छुट्टी का समय है इस समय तुम अपने मायके जाती थी और रिंकी अपने बच्चों के साथ यहाँ आती थी मैं भी साल भर इंतजार करती थी बेटा ...इस बार मन बड़ा व्याकुल हो रहा था...कल रात रिंकी का फोन आया था बड़ी चहककर कह रही थी...पता है मम्मी ....आज मैं उदास थी सुबह से ...अम्मा जी ने मेरा चेहरा पढ़ लिया और फिर क्या मुझे बोली सुन बेटी अब हम कुछ दिन मां -बेटी बनकर रहेंगे, घर में तेरी पसंद का ही सब बनेगा और मैं खुद बनाकर तुझे खिलाऊंगी तेरी जो मर्जी वह कर खुलकर जी ले .....मम्मी मैं बहुत खुश हूं ससुराल भी मायका बन गया आज तो..उसकी इन बातों से मुझे भी अपार खुशी हुई और एहसास भी कि बेटी तो मेरे घर भी है ...बेटा नंदिनी चल हम भी मां- बेटी बनकर रहेंगे शुरुआत मेरे हाथ की बनी चाय से करते हैं....नंदिनी और शालिनी दोनो की आंखों में खुशी के आंसू थे और बाहर पापा जी खड़े मुस्कुरा रहे थे, माँ - बेटी के रिश्ते के जन्म पर...एक सुंदर रचना....🙏
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